राजस्थान में मुख्यमंत्री विदेश जाकर निवेश मांग रहे हैं, वहीं जयपुर के आमेर SDM बजरंग लाल स्वामी पर ‘प्रताप यूनिवर्सिटी’ के निर्माण में बाधा डालने के आरोप लगे हैं। हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद जमीन की नीलामी की कोशिश और राजस्व रिकॉर्ड में “रिमार्क” डालने के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करें।
जयपुर: राजस्थान की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने ‘राइजिंग राजस्थान’ जैसे अभियानों के माध्यम से विदेशी निवेशकों को राजस्थान में निवेश करने का आह्वान किया है, लेकिन जयपुर प्रशासन इन निवेशकों को परेशान कर रहा है। अब प्रशासनिक गलियारों में आमेर के चंदवाजी (सुंदरपुरा) स्थित प्रताप विश्वविद्यालय और उपखंड अधिकारी बजरंग लाल स्वामी के बीच उपजा विवाद चर्चा का विषय बन गया है। आरोप है कि “साहब” की जिद और अदालती आदेशों की अनदेखी के कारण राज्य में करोड़ों का निवेश अधर में लटका हुआ है।

हाईकोर्ट के द्वारा रोक लगाई गई पर भी से नीलामी की ‘गुपचुप’ योजना
राजस्थान हाईकोर्ट में वर्तमान में चल रहे 15 वर्ष पुराने लेबर सेस से पूरा मामला जुड़ा हुआ है। इस मामले में, कोर्ट ने विश्वविद्यालय की संपत्ति की किसी भी तरह की नीलामी या दंडात्मक कार्रवाई पर स्पष्ट प्रतिबंध लगा रखा है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि आमेर SDM कार्यालय ने इस “स्टे” को छोड़कर गुपचुप तरीके से विश्वविद्यालय की जमीन की नीलामी करने की कोशिश की। इस प्रक्रिया को आनन-फानन में रोका गया जब विश्वविद्यालय प्रबंधन को इसकी भनक लगी और वे मौके पर पहुंचकर न्यायिक आदेश दिखाए।
करोड़ों का समझौता और एक ‘रिमार्क’ की अवरोध
राजस्थान सरकार ने महाराणा प्रताप ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस (कानपुर) के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया है जिसके अंतर्गत यहां एक सुंदर ‘मेडिसीटी’ का निर्माण किया जाएगा। लेकिन आरोप है कि SDM बजरंग लाल स्वामी ने राजस्व रिकॉर्ड में मुख्य सड़क की लगभग तीन बीघा महंगी जमीन पर एक “रिमार्क” (नोट) डाल दिया है, जिससे पूरे प्रोजेक्ट का मूल्य गिर गया है।
- इस रिमार्क की वजह से निवेशकों को योजना के लिए बैंक फाइनेंस और अन्य आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी करने में बहुत मुश्किल हो रही है।
- निवेशकों का कहना है कि वे राजस्थान छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे अगर प्रशासनिक दुर्व्यवहार और गलत नोटिस इसी तरह जारी रहेंगे।
नौकरशाही का दबदबा या निवेश मित्र राजस्थान?
सामाजिक और व्यापारिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि निचले स्तर के अधिकारी ऐसे आत्मघाती कदम क्यों उठा रहे हैं जब मुख्यमंत्री स्वयं निवेश लाने की कोशिश कर रहे हैं? University Management ने जिला कलेक्टर को सौंपे गए शिकायत पत्र में स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें बार-बार नोटिस देकर और नीलामी का भय दिखाकर प्रताड़ित क्यों किया जा रहा है, जबकि वे कुल मांग की 15% राशि पहले ही जमा कर चुके हैं और मामला कोर्ट में है?