Jharkhand में माओवादी समाप्त: झारखंड शब्द सुनते ही लोगों को नक्सली हिंसा और आतंक की याद आती थी। शाम ढलते ही राज्य के अधिकांश हिस्से में नक्सली सरकारें चलने लगीं। लेकिन आज, सुरक्षा बलों की साहसिकता और केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों ने इस भयानक चित्र को पूरी तरह बदल दिया है।
रांची: भारत को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य पूरा हो गया है। अब ग्रोथ कॉरिडोर रेड कॉरिडोर बन सकेगा। झारखंड जैसे जनजातीय बाहुल्य राज्यों में नक्सलवाद कम होने से लोगों में बदलाव की नई उम्मीदें जगी हैं। एक दशक में राज्य में 200 से अधिक नक्सली मारे गए। सैकड़ों लोग वहाँ गिरफ्तार हुए, और सैकड़ों ने अपने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में भाग लिया।

हालाँकि, एक करोड़ का इनामी नक्सली मिसिर बेसरा सारंडा के जंगलों में अपने दल में ४० से ४५ लोगों के साथ छिपा है। सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यह भी चर्चा है कि मिसिर बेसरा दबाव में आकर पुलिस के सामने सरेंडर करना चाहता है।
एक समय में नक्सलियों की समानांतर सरकार को देखने मिलता था
झारखंड में शाम को नक्सली हिंसा की वजह से ग्रामीण इलाकों में जनजीवन ठहर गया था। कई दूरस्थ इलाकों में नक्सलियों की एक अलग सरकार भी थी। लेकिन अब स्थिति सुरक्षा कर्मियों की साहस से बदल गई है। नक्सलियों को सुरक्षा बलों ने घुटने पर ला दिया है।
ग्रामीण लोगो के जीवन में चहल-पहल वापस आई
बूढ़ा पहाड़ और पारसनाथ से लेकर सारंडा तक के जंगली इलाकों में कभी नक्सली थे, लेकिन अब सुरक्षा बलों की कोशिशों से आम लोगों की चहल-पहल लौट आई है। पुराने पहाड़ों और पारसनाथ पहाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने अपनी जगह बनाई है। जबकि सारंडा के कुछ हिस्सों में नक्सलियों ने जंगली मार्ग पर आईईडी सुरंगें बनाई हैं। जो सुरक्षा बलों द्वारा धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।
नक्सलवाद की उत्पत्ति और समाप्ति को जानें
नक्सलवाद झारखंड में 1967 के पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी विद्रोह से पैदा हुआ है। 70 के दशक में विभाजित बिहार के पलामू और गिरिडीह में जल-जंगल और जमीन की लड़ाई के नाम पर राष्ट्रविरोधी शक्तियां आने लगीं। लगभग चार-पांच दशकों तक, लाल आतंक की खबरों ने अखबारों के पन्ने भर दिए। दशकों तक, “जल-जंगल-जमीन” के नाम पर शुरू हुआ हिंसक आंदोलन ने राज्य की सुरक्षा को खतरा बनाए रखा।
विकास के नवीन प्रकाश
लेकिन सुरक्षा बलों के उत्साह और सरकार की नवीन नीतियों से अब ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति बदलने लगी है। आज, इन सुदूरवर्ती क्षेत्रों में पक्की सड़कें, स्कूल-अस्पताल और मोबाइल टावर देखने को मिलते हैं। यह बदलाव इतना सुखद है कि पिछले चुनावों में भी उन इलाकों में भारी मतदान हुआ, जहां लोग वोट डालने से पहले रोते थे। झारखंड में अब नक्सलवाद बहुत कम है। शांति की पुनःस्थापना ने राज्य में पर्यटन, खनन और खनिज-आधारित उद्योगों के लिए अनगिनत अवसर पैदा किए हैं।
नेतृत्व की भावना: विकास का शोर, शांत बंदूकें
रांची के सांसद और रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की इच्छाशक्ति को इस बदलाव का श्रेय दिया है। उनका कहना था कि आज विकास का शोर सुनाई देता है, जहां पहले बारूद की गंध और बंदूक की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी।
2026 में सूरज झारखंड में सुख-शांति लाता है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह भी एक ऐतिहासिक जीत है कि जिस राज्य को कभी “लाल आतंक का हृदय” कहा जाता था, उसके नक्शे से इन लाल धब्बों को हटा दिया जाए।