दो दशक बाद बिहार को नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री मिलेगा। कम से कम कोई इससे इनकार नहीं कर रहा है। साथ ही, यह स्पष्ट है कि बीजेपी को राज्यपाल का पद मिलेगा। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि अगला राष्ट्रपति कौन होगा?
पटना: बिहार की राजनीति अब उस मुहाने पर है जहां ‘सुशासन बाबू’ के नाम से जाना जाता नीतीश कुमार का दौर गिरावट पर है। सत्ता के गलियारों में नीतीश कुमार को केंद्रीय राजनीति में स्थानांतरित करने की चर्चा आम है। भाजपा बिहार में ‘वैकल्पिक सरकार’ का ब्लूप्रिंट बना रही है। लेकिन, इस ब्लूप्रिंट में ‘चेहरा’ सबसे बड़ी चुनौती है। भाजपा में 2029 के लोकसभा चुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए दो ध्रुव बन गए हैं। संगठन की शुद्धता और बेदाग छवि वाले विजय सिन्हा एक ओर हैं, जबकि सम्राट चौधरी ओबीसी राजनीति का आक्रामक चेहरा हैं।

आरएसएस और कैडर के रुझान बनाम अमित शाह
भाजपा में अब ‘ओरिजिनल वर्सेस हाइब्रिड’ की लड़ाई सतह पर है। पार्टी का एक बड़ा और अनुभवी वर्ग इस बात पर अड़ गया है कि भाजपा के ‘मूल कैडर’ का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे।
- विजयन सिन्हा (निष्ठा और सुशासन का मुखपत्र): विजय सिन्हा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि बूथ स्तर से राजनीति शुरू करने वाले भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता की कहानी है। संघ की शाखाओं से आए विजय सिन्हा को आरएसएस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘अघोषित वरदान’ माना जाता है। विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी कार्यशैली और उनकी नीतीश कुमार से सीधी मित्रता ने उन्हें कार्यकर्ताओं में महान बनाया। भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ उनकी छवि एक अनुशासित नेता की है।
- श्री चौधरी (रणनीतिक और बाहरी टैग): दूसरी ओर सम्राट चौधरी हैं, जिन्हें गृह मंत्री अमित शाह की ‘स्ट्राइक फोर्स’ कहा जाता है। लेकिन सम्राट का ‘बैकग्राउंड’ उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। राजद और जदयू की राजनीतिक शिक्षा से निकले सम्राट आज भी भाजपा का पुराना कैडर को ‘बाहरी’ मानता है। पार्टी में यह बहस तेजी से फैल रही है कि क्या वैचारिक निष्ठा को सत्ता की मजबूरी के लिए त्याग देना संभव है?
सम्राट चौधरी
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं उनके अतीत से बहुत दूर हैं। भाजपा जैसी पार्टी, जो ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ का दावा करती है, सम्राट के कुछ मुद्दे उसके लिए चिंताजनक हो सकते हैं।
- अपराधों और मुकदमों की सूची: शक्ति और सत्ता की रक्षा ने सम्राट चौधरी का राजनीतिक उदय किया। उन पर हत्या जैसे गंभीर अपराधों में नामजद होने के आरोप हैं। तकनीकी रूप से वे बरी हो चुके हैं, लेकिन बिहार के लोगों में उनकी छवि एक ‘आक्रामक बाहुबली’ नेता की तरह है। अगर भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री बनाती है, तो विपक्ष को यह कहने का मौका मिलेगा कि भाजपा ने ‘जंगलराज’ से लड़ते हुए खुद एक विवादग्रस्त व्यक्ति को पदभार सौंप दिया।
- शिक्षण योग्यता पर व्यापक बहस: पार्टी में भी कई लोगों ने सम्राट चौधरी की डिग्री को लेकर हुए खुलासों से असहज हैं। भाजपा को सार्वजनिक जीवन में शुचिता का दावा करने वाली पार्टी को एक ऐसा मुख्यमंत्री देना, जिसकी शिक्षा पर संदेह है, देश भर में विवाद पैदा कर सकता है।
- दलबदल की उत्पत्ति: सम्राट को एक निष्ठावान संगठन में बार-बार दल बदलना उनके ‘अवसरवादी’ होने का संकेत है। कैडर का मानना है कि अगर कोई नेता राजद या जदयू का सहयोग नहीं करता, तो वह भाजपा की विचारधारा को भविष्य में मजबूत करने में असमर्थ होगा।
विजय सिन्हा
विजय सिन्हा का पलड़ा भारी है क्योंकि वे भाजपा के ‘ब्रांड’ से पूरी तरह मेल खाते हैं। उनके पक्ष में कई ठोस बहस हैं।
- बेदाग और स्वच्छ अतीत: विपक्ष को विजय सिन्हा के खिलाफ कोई गंभीर आपराधिक मामला नहीं दिखाई देता। मध्यम वर्ग और शहरी मतदाताओं को उनकी ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि आकर्षित करती है।
- नीतीश के प्रति दृढ़ता: विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए विजय सिन्हा ने सदन के भीतर नीतीश कुमार के साथ तीखी बहस करके दिखाया कि वे दबाव में नहीं झुकते हैं। यह साहस उन्हें कैडर में एक अच्छे नेता बनाता है।
- प्रशासनिक योग्यता: उनके पास सरकार और सदन चलाने का व्यापक अनुभव है, क्योंकि वे मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष रहे हैं। वे नियम मानते हैं, जो बिहार जैसे जटिल राज्य के प्रशासन को सुधारने के लिए आवश्यक हैं।
- आरएसएस का अटूट भरोसा: विजय सिन्हा का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ सबसे बड़ा प्लस पॉइंट संघ है। संघ का मानना रहा है कि विजय सिन्हा भाजपा को सत्ता में आने पर अपनी मूल सिद्धांतों से अलग करना चाहिए और वह सिद्धांत संघ के प्रवक्ता हैं।
धर्म का सामाजिक समीकरणों में संकट: सवर्णों की तुलना में ओबीसी
| तुलनात्मक बिंदु | सम्राट चौधरी | विजय सिन्हा |
| सामाजिक आधार | कुशवाहा (OBC) – 9% के करीब वोट बैंक | भूमिहार (सवर्ण) – भाजपा का कोर आधार |
| राजनीतिक शैली | आक्रामक, सड़कों पर प्रदर्शन | संसदीय, मर्यादित, प्रशासनिक |
| विपक्षी हमला | अतीत और मुकदमों पर घेरना आसान | छवि पर हमला करना मुश्किल |
| संदेश | ओबीसी सशक्तिकरण | सुशासन और वैचारिक शुद्ध |
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर भाजपा सम्राट चौधरी (ओबीसी) को छोड़कर सवर्ण विजय सिन्हा को चुनती है, तो राजद इसे ‘पिछड़ा विरोधी’ कदम कहकर प्रचारित करेगी। भाजपा नेताओं का कहना है कि उत्तर प्रदेश में सवर्ण योगी आदित्यनाथ के सफल प्रदर्शन के बाद बिहार में भी ‘छवि’ को ‘जाति’ से अधिक महत्व दिया जा सकता है।
क्या विजय सिन्हा का भाग्य 2029 में तैयार होगा?
अंततः, संघर्ष ‘शक्ति बनाम शुचिता’ है। विजय सिन्हा की गरिमा सरकार की प्रशंसा करती है, जबकि सम्राट चौधरी की आक्रामकता रैलियों में भीड़ लाती है। सम्राट का अतीत उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है, जबकि विजय सिन्हा की निष्ठा उनके लिए सबसे बड़ी राहत है। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह अब चुनौती का सामना करेंगे। क्या भाजपा जातिगत गणित के दबाव में एक विवादित अतीत को स्वीकार करेगा या अपने ‘मूल कैडर’ को तवज्जो देकर एक नई शुरुआत करेगी? इसी निर्णय बिहार की राजनीति का अगला भाग है।