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राजनीति में हड़कंप मच गया जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जेडीयू नेता हरिवंश नारायण सिंह को तीसरी बार राज्यसभा में नामित किया

राजनीतिक हलचल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की तीसरी बार राज्यसभा के लिए हरिवंश नारायण सिंह की मनोनीतियों से हुई है। माना जाता है कि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वापसी है। हम इसके पीछे की कहानी जानते हैं।

पटना: जेडीयू नेता हरिवंश नारायण सिंह को तीसरी बार राज्यसभा के लिए मनोनीत कर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक तरह से अगला उप सभापति का रास्ता साफ कर दिया। राजनीतिक गलियारों का कहना है कि जदयू के सदस्यों को इस बार पूर्व उप सभापति हरिवंश नारायण की मनोनीतियों से आश्चर्यचकित और दुखी महसूस हुआ है। जदयू में भी चर्चा होने लगी कि बीजेपी नेतृत्व को इसकी भनक भी नहीं लगी। लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश नारायण को तीसरी बार राज्यसभा भेजकर राजनीतिक चालबाजी की? बीजेपी के रणनीतिकारों की इस रणनीति को समझते हैं। लेकिन इस प्रश्न का जवाब पहले आएगा।

जनता दल यू और हरिवंश नारायण दोनो को जाने क्या

पिछले कुछ वर्षों में उप सभापति रहते हुए हरिवंश नारायण तकनीकी रूप से जदयू के सदस्य रहे। यह बयान भी वर्तमान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन, उर्फ ललन सिंह का है। ललन सिंह ने साफ कहा कि हरिवंश नारायण ने पिछले एक वर्ष 10 दिन से पार्टी की किसी भी बैठक में हिस्सा नहीं लिया है, जब उन्हें जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटा दिया गया था। ये जदयू की संसदीय बैठकों में नहीं गए।उन्होंने आरोप लगाया कि ये पार्टी से अधिक प्रधानमंत्री की सुनते हैं। पार्टी की बैठक में भी नहीं आते, भले ही उन्हें बुलाया जाए।

भाजपा के साथ भी हरिवंश नारायण दिखाई दें!

अब हरिवंश नारायण को ही निर्णय लेना होगा कि वे संविधान का पालन कर रहे थे या बीजेपी का समर्थन कर रहे थे, या पार्टी लाइन से हटकर। इसका कारण बहुत छोटा फर्क है। और इस अंतर के बीच हरिवंश नारायण का व्यक्तित्व पूरा होना ही पर्याप्त है।

पार्टी लाइन से हरिवंश नारायण को कहाँ हटाया गया?

जब वे उपसभापति थे, तो हरिवंश नारायण कुछ समय तक बीजेपी से अधिक जदयू के पक्ष में दिखे या उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व उभर कर सामने आया होगा। सब कुछ हरिवंश नारायण को ही तय करने दें। लेकिन याद रखें उन टिप्पणियों को, जहां वे पार्टी से बाहर दिखते हैं..।

1.दिल्ली सेवा बिल: जनता दल यूनाइटेड के राज्यसभा सांसद और उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने दिल्ली सेवा बिल पर वोटिंग करते समय पार्टी के व्हिप का पालन नहीं किया। बिल के खिलाफ वोट देने के बजाय, उन्होंने संवैधानिक पद की गरिमा की चिंता की और वोटिंग प्रक्रिया से दूर रहे। पार्टी लाइन पर यह बीजेपी के करीब आने और जदयू के खिलाफ था। इसके बाद, जदयू ने अपने सभी सदस्यों को दिल्ली सेवा बिल के खिलाफ वोट देने के लिए व्हिप भेजा। यह व्हिप से भिन्न था।

2.नव निर्मित संसद भवन: जदयू ने भी नए संसद भवन के उद्घाटन का विरोध किया था। जदयू के रणनीतिकारों ने एक स्पष्ट संदेश देने के लिए पार्टी लाइन पर अडिग होने की भी इच्छा व्यक्त की। लेकिन पार्टी के व्हिप के बजाय, उन्होंने उप सभापति का संवैधानिक पद चुना। और उन्होंने नव निर्मित संसद भवन के उद्घाटन में भी भाग लिया।

जदयू दिखावा करने का काम किया जा रहा है क्या

राजनीतिक गलियारों का कहना है कि हरिवंश नारायण को तीसरी बार राष्ट्रपति पद पर नामांकित किए जाने पर बीजेपी ने उनका नाम छुपाया क्यों; अगर बीजेपी ने ऐसा नहीं किया तो यह सिर्फ दिखावा होगा। जब जदयू के रणनीतिकारों को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर निकाल दिया गया था, तो बीजेपी की ओर से उनके अपनाए जाने पर कोई खेद नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आसपास देखने से पता चलता है कि वे पार्टी लाइन से बाहर जानकारों की बहुतायत रखते हैं और उनसे सरकार को सुधारने में मदद भी लेते हैं। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की इसी गुणवत्ता ने हरिवंश नारायण को लगातार तीसरी बार राज्यसभा में नामांकित किया, जब जदयू ने खुद किनारा कर लिया।

मोदी ने बेपटरी नीतीश को रिटर्न गिफ्ट दिया गया

राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी राज्यसभा भेजे जाने के मुद्दे पर बेपटरी हो गए। उन्होंने कहा कि वे तीसरी बार लगभग कभी किसी को राज्यसभा में नहीं भेजेंगे, जिससे उनकी बहस गहरी हो गई। पर रामनाथ ठाकुर को तीसरी बार भेजने के बाद उनका यह नियम स्वयं लागू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश नारायण को एक प्रतिस्थापन उपहार भी दिया। दिल्ली सेवा बिल या नए संसद भवन के उद्घाटन का समय, हरिवंश नारायण पार्टी की लाइन से बाहर निकलकर प्रधानमंत्री मोदी के साथ दिखाई देना चाहिए। राजनीतिक गलियारों में इसे राजनीतिक क्रांति की तरह देखा जा रहा है, जहां प्रधानमंत्री की इस कोशिश को आक्रोशित राजपूतों की पीड़ा को शांत करना समझा जाता है।

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