Transsexual कानून: 2026 में राष्ट्रपति ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम को मंजूरी दी। 30 मार्च को अधिसूचना जारी की गई थी। सरकार ने कहा कि नए कानूनों से पहचान प्रक्रिया सरल होगी, अधिकारों की सुरक्षा बढ़ी होगी और अपराधों को सख्त सजा मिलेगी। लेकिन आप इस कानून की विरोधी वजह जानते हैं..।
राजेश कुमार: हाल ही में राष्ट्रपति ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को मंजूरी दी। 30 मार्च को भी आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया गया है। जाने कि 2019 में इस संशोधन के बाद मूल कानून में कौन-से नए बदलाव हुए हैं और इस पर बहस क्यों चल रही है?

भारत में ट्रांसजेंडर कानून में पिछले कुछ समय में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है। सरकार का दावा है कि नया कानून ट्रांसजेंडरों के अधिकारों को अधिक सुरक्षित करेगा, पहचान की प्रक्रिया को सरल बना देगा और अपराध करने पर कठोर सजा देगा।
बदली हुई परिभाषा जाने
कानून ने स्पष्ट रूप से कहा कि किन्नर, हिजड़ा, अरावनी या जोगता के रूप में सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले लोगों को ट्रांसजेंडर की कैटिगरी में शामिल किया जाएगा। वे भी शामिल हैं, जिनके शरीर में जन्म से ही ऐसे जैविक अंतर (प्राथमिक यौन विशेषताएं, बाहरी जननांग, गुणसूत्र पैटर्न या हार्मोन उत्पादन अलग) हैं, जिससे उनका शारीरिक विकास पूरी तरह से सामान्य पुरुष या महिला जैसा नहीं होता।
पहचान विधि में परिवर्तन
पहचान की सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में बहुत बदलाव हुआ है। अब केंद्र और राज्य सरकारें एक “प्राधिकरण” नियुक्त करेंगी, जो पहले जिला मैजिस्ट्रेट था। मुख्य चिकित्सा अधिकारी या उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी इस मेडिकल बोर्ड को अध्यक्षता देंगे।
नाम बदलने की अनुमति
यदि किसी को ट्रांसजेंडर पहचान का सर्टिफिकेट मिलता है, तो उसे अपने जन्म पत्र से लेकर हर दस्तावेज में अपना पहला नाम बदलने का कानूनी अधिकार होगा। जब सर्टिफिकेट प्रक्रिया मेडिकल बोर्ड पर निर्भर होगी, आलोचकों का कहना है कि दस्तावेजी अधिकार भी मेडिकल बोर्ड पर आ जाएंगे।
इन पर नए दायित्व
यदि कोई जेंडर बदलने की सर्जरी करवाता है तो संबंधित मेडिकल संस्थान को जिला मैजिस्ट्रेट और प्राधिकरण को जानकारी देनी चाहिए। सर्जरी के बाद बदले हुए लिंग का प्रमाणपत्र लेने के लिए जिला मैजिस्ट्रेट से संपर्क करना होगा। नया सर्टिफिकेट जिला मैजिस्ट्रेट मेडिकल सुपरिटेंडेंट या मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी किया जाएगा।
कानून के मुख्य रूप से प्रावधान जानें
- यदि किसी ट्रांसजेंडर को सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोका जाता है या उससे जबरन काम कराया जाता है, तो उसे छह महीने से दो साल की जेल और जुर्माना हो सकता है।
- ट्रांसजेंडरों को घर, परिवार या शहर से निकालना या वहाँ रहने से रोकना भी दंडनीय है। अब छह महीने से दो साल तक की सजा और कैद हो सकती है।
- शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक प्रताड़ना अब अपराध है।
- यदि किसी अडल्ट का अपहरण कर उसे जबरन ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने, सर्जरी कराने, केमिकल या हार्मोनल प्रक्रियाओं से गुजरने या गंभीर चोट लगे तो दोषी को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। साथ ही कम से कम २ लाख रुपये का जुर्माना भी देना होगा।
- किसी बच्चे का अपहरण कर उसे जबरन ट्रांसजेंडर बनाने, गंभीर शारीरिक चोट पहुंचाने या शोषण करने पर कठोर आजीवन कारावास और कम से कम 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
- बंधुआ मजदूरी या भीख मांगने के लिए किसी व्यक्ति या बच्चे को ट्रांसजेंडर बनने को मजबूर किया जाता है, तो दोषी को 5 से 14 साल की कैद और भारी जुर्माना हो सकता है।
संसद से सड़क तक विरोध का विस्तार क्यों हुआ?
- राज्यसभा में विपक्षी दल ने मांग की कि विधेयक को सिलेक्ट कमिटी या संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा जाए ताकि इस पर व्यापक चर्चा हो सके। तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल सहित कई दलों ने आरोप लगाया कि जिस समुदाय के लिए कानून बनाया जा रहा था, उसे पर्याप्त सलाह नहीं दी गई थी।
- बिल पारित होने वाले दिन नैशनल काउंसिल ऑफ ट्रांसजेंडर पर्सन्स के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट की ट्रांसजेंडर अधिकार समीक्षा समिति ने भी केंद्र से बिल को वापस लेने या इसकी समीक्षा करने की मांग की थी। राजस्थान हाई कोर्ट की टिप्पणी, जिसमें राज्य-नियंत्रित अस्मिता प्रक्रिया का खतरा बताया गया था, का भी उल्लेख किया जा रहा है।
- सरकार का जवाब: मंत्री सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता ने
- संसद ने कहा कि न्याय, सुरक्षा और शोषण को बचाने के लिए यह संशोधन लाया गया था। सरकार का दावा है कि संगठित शोषण, भीख मंगवाने, जबरन पहचान थोपने और बच्चों के खिलाफ अपराधों पर पहली बार इतने कठोर दंड लगाए गए हैं।
यह बहस क्यों हो रही है?
- खुद की पहचान को मेडिकल सर्टिफिकेशन पर आधारित प्रणाली में बदलने का आरोप, यानी “मैं कौन हूँ” की जगह लेगा
- कानून की परिभाषा खुद महसूस की गई जेंडर को नहीं मानती
- अलग-अलग सेक्शुअल विचारधाराओं वाले लोगों को दायरे से बाहर करने पर आपत्ति
- यह गरिमा के खिलाफ था कि पहचान प्रक्रिया में मेडिकल बोर्ड की आवश्यकता थी
- सर्जरी से जुड़ी जानकारी प्रशासनिक निकायों को देना भी निजता के खिलाफ है।
- समुदाय और हितधारकों से पर्याप्त सलाह नहीं मिलने का दावा
- विपक्ष, LGBTQIA+ समूहों और कुछ विशेषज्ञ समितियों ने एक रिपोर्ट की मांग की।