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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रेन दुर्घटना में गर्भवती महिला की मौत हो गईं इनके बाद , अजन्मे बच्चें के लिए 8 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया गया हैं

न्यायालय ने फैसला दिया कि पाँच माह या उससे अधिक आयु के अजन्मे शिशु को जीवित शिशु के समान माना जाएगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय रेलवे को 2018 में ट्रेन में चढ़ते समय मरने वाली गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण की मृत्यु के लिए ₹8 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है।

2025 में, रेलवे दावा अधिकरण ने एक महिला की मृत्यु पर ₹8 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया था। यह महिला मरुधर एक्सप्रेस से बाराबंकी से बांदीकुई रेलवे स्टेशन जाना चाहती थी।

बाद में, महिला के परिवार ने हाईकोर्ट में अर्ज़ी देकर महिला के गर्भ में पल रहे भ्रूण की मृत्यु के लिए अधिक रकम देने की मांग की। वह भ्रूण लगभग आठ से नौ महीने का था, जैसा कि अनुमान था।

जस्टिस प्रशांत कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के ‘कामना शर्मा बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पाँच महीने या उससे अधिक उम्र के अजन्मे बच्चे को एक जीवित बच्चे के बराबर माना जा सकता है।

26 फरवरी को न्यायालय ने कहा, “इसलिए, इस मामले में हुए हादसे में एक ऐसे मानवीय भ्रूण की भी मृत्यु हो गई, जिसे एक ‘व्यक्ति’ का दर्जा दिया जा सकता था।” वह बच्चा जीवित रहता और इस दुनिया में आता अगर यह दुर्घटना न हुआ होता।”

कोर्ट ने निर्णय दिया कि गर्भस्थ शिशु (foetus) एक अलग जीवन जीता है, इसलिए माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे के अधिकार देश के कानूनों द्वारा सुरक्षित हैं। कोर्ट ने निर्णय दिया कि गर्भस्थ शिशु का नुकसान वास्तव में एक बच्चे का नुकसान है।

बेंच ने कहा, “उस अजन्मे बच्चे को, जिसका कभी जीवित जन्म नहीं हो पाता, एक ‘व्यक्ति’ माना जाता है, जिसकी मृत्यु के लिए मुआवज़े का दावा किया जा सकता है। गर्भस्थ शिशु को एक बच्चे के रूप में देखते हुए, अपीलकर्ता उसके नुकसान का अलग से भुगतान करने के हकदार हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे अधिनियम में “गर्भस्थ शिशु” शब्द का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन इस मामले को रेलवे अधिनियम की धारा 124A के दायरे में लाया जाएगा क्योंकि यह मृत्यु एक रेल दुर्घटना से जुड़ी किसी अप्रिय घटना के परिणामस्वरूप हुई है।

कोर्ट ने इसलिए कहा कि ऐसे मामलों में रेलवे को दावा करने वालों को मुआवज़ा देना कानूनी है।

कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा, “चूँकि गर्भस्थ शिशु को एक बच्चे के रूप में ही माना जाता है, इसलिए गर्भस्थ शिशु या बच्चे की मृत्यु को माँ की मृत्यु से अलग, एक स्वतंत्र दुर्घटना के रूप में देखा जाएगा।” दावा करने वाले भी गर्भस्थ शिशु के नुकसान का 8,00,000 रुपये का अतिरिक्त भुगतान पाने के हकदार हैं।”

कर्नाटक हाईकोर्ट, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पहले भी कहा था कि गर्भस्थ शिशु की मृत्यु को बच्चे की मृत्यु के बराबर माना जाना चाहिए। इन निर्णयों को भी फरवरी में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उल्लेख किया था।

याचिकाकर्ता के वकील प्रदीप कुमार सिंह, अमित कुमार सिंह और अमृता सिंह ने पैरवी की।

भारतीय रेलवे के वकील महेंद्र कुमार ने पैरवी की।

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