किसी शादीशुदा व्यक्ति को किसी बालिग महिला के साथ लिव इन करना स्वीकार्य है? हाई कोर्ट ने कहा: कोई अपराध नहीं, जिसके चलते हुआ बहस

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निर्णय दिया कि किसी शादीशुदा पुरुष का किसी बालिग महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कानूनी अपराध नहीं है। इसके बावजूद, इस निर्णय के बाद समाज में विवाद बढ़ गया है।

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप पर दिए गए फैसले के बाद कानून और नैतिकता पर बहस छिड़ गई है। हाई कोर्ट ने कहा कि कोई शादीशुदा आदमी एक बालिग महिला के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहना कानूनी के हिसाब से कोई अपराध नहीं हैं। कानून और नैतिकता अलग-अलग होने चाहिए। कानूनी जानकार मानते हैं कि नैतिकता की कसौटी, समाज की राय और कानून अदालतों को निर्णय देते हैं। उसकी दृष्टि से अदालत मामले को नहीं देखती, बल्कि कानून और संविधान की कसौटी पर।

वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए चुनौती

यह मामला उत्तर प्रदेश का है और इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर बहुत बहस हुई है। इस निर्णय से खासकर शादीशुदा महिलाएं चिंतित हैं कि उनका वैवाहिक जीवन खतरे में पड़ सकता है अगर उनके पति को कानून का कोई डर नहीं होगा। यद्यपि कानून के जानकारों का कहना है कि यह अपराध नहीं है, पत्नी चाहे तो पति से तलाक ले सकती है।

इस आधार पर तलाक ले सकते हैं

रमेश गुप्ता, वरिष्ठ क्रिमिनल लॉयर, बताते हैं कि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा-497 को अपराध से बाहर कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गैरसंवैधानिक ठहराया। शादीशुदा दंपत्ति में से कोई भी विवाह से बाहर संबंध बनाता है, तो दूसरा पार्टनर इस आधार पर तलाक मांग सकता है। यानी एडल्टरी का मुकदमा नहीं चलेगा।

आईपीसी की धारा-497 क्या कहती है?

वास्तव में, आईपीसी की धारा-497 (एडल्टरी, यानी व्यभिचार) कहता है कि अगर एक शादीशुदा महिला किसी अन्य व्यक्ति से संबंध बनाती है, तो महिला का पति उस अन्य व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर सकता था। पति ही ऐसे मामले में शिकायती कर सकता था। ऐसे रिश्ते से परेशान होने पर पति अदालत में शिकायत कर सकता था। और मामला दर्ज नहीं होगा अगर पति आपत्ति नहीं करता।

कानून और नैतिकता एक पूरी तरह से अलग विषय हैं

जैसा कि सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रेखा अग्रवाल ने बताया, मामले को संवैधानिक नैतिकता से देखा गया क्योंकि एडल्टरी कानून पर कई प्रश्न उठाए गए थे। दरअसल, व्यभिचार के मामले में महिला का पति शिकायती हो सकता था और आरोपी सिर्फ पत्नी से संबंध बनाने वाले गैर मर्द हो सकते थे।

  • आदमी अपनी पत्नी को इस मामले में आरोपी नहीं बना सकता था। यह भी सवाल उठाया गया कि महिला को उकसाने के मामले में आरोपी क्यों नहीं बनाया जाए जब वह उस अपराध में बराबर की सहभागी है? दूसरा सवाल था कि अगर महिला के पति को ऐसा संबंध मंजूर है तो गैर मर्द से संबंध अपराध नहीं होगा, तो महिला का असतित्व पति की जागीर बन गया। क्योंकि पति की अनुमति से जो कुछ अनैतिक है, वह नैतिक कैसे हो सकता था?
  • मामले में सिर्फ महिला के पति को शिकायत करने का अधिकार था, और इस तरह देखा जाए तो वह शादी के बाद पति की संपत्ति बन गई। रेखा अग्रवाल बताते हैं कि जब यह कानून लागू था, तब भी शादीशुदा आदमी किसी बालिग और अविवाहित महिला के साथ अफेयर या संबंध बनाता था तो पत्नी को सिर्फ तलाक लेने का ही अधिकार था। लेकिन 2018 में कानून को खत्म करने के बाद, ऐसे संबंध में सहभागी महिला के पति को अब उसकी पत्नी के साथ शादी कर रहे तीसरे व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने का अधिकार नहीं है।
  • ऐसे संबंध बनाने वालों के खिलाफ अब कानून में कोई अपराध नहीं है, लेकिन ऐसे मामले में तलाक लिया जा सकता है। यह स्पष्ट है कि ऐसे कानूनों को लागू करने वालों पर एक मानसिक बैरियर भी खत्म हो गया है. इसके अलावा, शादीशुदा महिलाओं को अपने वैवाहिक जीवन को बचाने का दबाव है और उनके मन में सवाल उठता है कि अगर उनके पति घर से बाहर ऐसे संबंध बनाते हैं तो वे क्या करेंगे?
  • हाल ही में शहर में सेक्सुअल स्वच्छंदता काफी बढ़ी है, हालांकि समाज ऐसे संबंध को नैतिकता के चश्मे से देखता है और सामाजिक तौर पर यह अनैतिक माना जाता है। यह सामाजिक नैतिकता के अनुसार अनुचित है, लेकिन अंततः यह कड़वी सच्चाई है। सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा कि सेक्सुअल स्वायत्तता भी संवैधानिक अधिकार है, साथ ही गरिमा, स्वायत्तता और व्यक्तिगत इच्छा का अधिकार। पूरे मामले को संवैधानिक नैतिकता से देखना चाहिए।

विवाहित रिलेशनशिप में घरेलू ऋण कब मिलेगा?

लिव इन रिलेशनशिप को सुप्रीम कोर्ट ने पहले से ही मान्यता दी है। 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशंस के बारे में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था कि ऐसे रिश्ते में रहने वाली युवतियां केवल कुछ शर्तें पूरी करने पर ही गुजारा भत्ता पा सकती हैं। न्यायालय ने निर्णय दिया कि लिव-इन रिलेशन में रह रही युवतियों को चार शर्तें पूरी करनी होंगी, जिससे वे गुजारा भत्ता पा सकें।

युवक-युवती को समाज के सामने खुद को पति-पत्नी की तरह पेश करना होगा. वे दोनों की उम्र कानून के अनुसार शादी करने योग्य हों, अपनी मर्जी से साथ रह रहे हों और लंबे समय तक खुद को जीवन साथी के रूप में समाज को दिखाएं।

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