रूस की एक महिला, जो अजमेर में अपने आप को जोगी सिद्ध करने हेतू ,पिछले 9 दिन से पुष्कर के घाट पर तपस्या में लगा , पूरा पढ़िए आखिर मामला क्या

अजमेर, राजस्थान में पुष्कर के जयपुर घाट पर आस्था का अद्भुत संगम दिखता है। रूस की योगी अन्नपूर्णा नाथ चैत्र नवरात्रि में 'खंडेश्वरी तपस्या' लगा हुआ हैं 17 साल पहले नाथ संप्रदाय में शामिल होने वाली यह साधिका पिछले कई दिनों से निरंतर खड़े रहकर साधना कर रही है।

अजमेर: सात समंदर पार की सरहदों को आध्यात्मिक धागे में पिरोने वाली श्रद्धा और आश्चर्य का एक ऐसा संगम इन दिनों राजस्थान की पवित्र नगरी पुष्कर के जयपुर घाट पर दिख रहा है। यहां चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर, नाथ संप्रदाय की एक साधिका योगी अन्नपूर्णा नाथ अपनी कठिन ‘खंडेश्वरी साधना’ में लीन हैं। यह बात कि वे पिछले कई दिनों से न सोए और न बैठे हैं, उनकी तपस्या की कठोरता को स्पष्ट करता है। वे सिर्फ खड़ी होकर ईश की सेवा कर रहे हैं।

रूस से पुष्कर की साहसिक यात्रा

योगी अन्नपूर्णा नाथ मूल रूप से रूस में रहते हैं। करीब 17 वर्ष पहले, उन्होंने भौतिक सुख-सुविधाओं और पश्चिमी चकाचौंध को छोड़कर भारत की धरती और उसकी धार्मिकता को अपनाया था। नाथ संप्रदाय के गुरु शुक्र नाथ योगी से दीक्षा ली और अपना जीवन योग और सेवा को समर्पित कर दिया। उन्हें भारत की ‘योगी अन्नपूर्णा’, रूस की ‘एलेना’ (परिवर्तित नाम) से भारत की ‘योगी अन्नपूर्णा’ बनाने के लिए यह केवल धर्म परिवर्तन नहीं था, बल्कि आत्मा की खोज भी थी।

खंडेश्वरी तपस्या: दृढ़ता का शिखर

19 मार्च को चैत्र नवरात्रि की घट स्थापना से शुरू हुई यह ‘खंडेश्वरी तपस्या’ योग मार्ग की सबसे कठिन साधनाओं में से एक है। Anupam Nath 24 घंटे लगातार खड़ी रहती है। उनका दृढ़ संकल्प नींद का त्याग करके दिन में एक बार भोजन करना है। घाट पर आने वाले श्रद्धालुओं की आंखें फटी की फटी रहती हैं जब वे एक विदेशी मूल की महिला को जटाओं के साथ पारंपरिक भगवा वस्त्रों में खड़ा देखते हैं। यह दृश्य न केवल आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन है, बल्कि यह भी साबित करता है कि आस्था के लिए भूगोल या भाषा कोई बाधा नहीं है।

पुष्कर के जयपुर घाट प्रेरणा श्रोत बन गया

पुष्कर आने वाले तीर्थयात्री अब ब्रह्मा मंदिर के दर्शन ही नहीं , बल्कि अन्नपूर्णा नाथ की इस साधना से प्रेरणा लेने के लिए जयपुर घाट पर उमड़ता जा रहा हैं। उनकी चिल्ला-चिल्लाकर मौन साधना बताती है कि मन में अटूट विश्वास और संकल्प हो तो शरीर की सीमाओं को भी पार कर सकते हैं। 28 मार्च को इस चुनौतीपूर्ण तपस्या का अंत होगा। तब तक, वे अपनी अडिग मुद्रा में खड़े रहकर विश्व में शांति और आध्यात्मिक विकास की प्रार्थना करेंगे। पुष्कर की साधना की महक अब रेतीली हवाओं में घुल चुकी है, जो आने वाले कई वर्षों तक लोगों के जेहन में एक मिसाल बनकर रहेगी।

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