200 साल पहले, जैसलमेर में हुए रियासतकालीन युद्ध में बीकानेर की सेना ने यहां के 'ईशर' (शिव) की प्रतिमा उठा ली थी। तब से यहां माता गणगौर की एकमात्र पूजा की जाती है। गवर माता आज भी ईशर की ओर देखती है। हम 200 साल पहले हुई घटनाओं का पता लगाते हैं, जो आज भी प्रभावी हैं।
जैसलमेर: राजस्थान की माटी शौर्य और परंपराओं का प्रतीक है, लेकिन सरहदी जिले जैसलमेर में मनाई जाने वाली गणगौर की कहानी एक दर्दनाक कहानी से कम नहीं है। जैसलमेर में आज भी भगवान शिव (ईशर) और माता पार्वती (गणगौर) के अटूट प्रेम की पूजा होती है। यहां की गणगौर आज भी करीब दो सदियों पहले हुए युद्ध का इंतजार करती है।

रियासतकालीन कसक: जब ‘ईशर’ को कर लिया गया अगवा
यह ऐतिहासिक घटना करीब 200 वर्ष पहले हुई थी। रियासत काल में बीकानेर और जैसलमेर के बीच टकराव था। बीकानेर की सेना ने चैत्र महोत्सव के दौरान जैसलमेर पर हमला किया। बीकानेर के सैनिकों ने भगवान शिव की लकड़ी की प्रतिमा जैसलमेर का ‘ईशर’ जबरन उठाकर अपने साथ ले लिया।
जैसलमेर के वीर योद्धाओं ने फिर से अद्भुत साहस दिखाया
दुश्मन सेना भी माता गणगौर की प्रतिमा (पार्वती) को ले जाना चाहती थी, लेकिन जैसलमेर के साहसी योद्धाओं ने माता की प्रतिमा को बचाया, लेकिन अपने ‘ईशर’ को वापस नहीं ला सके। तब से आज तक, जैसलमेर की गणगौर बिना पत्नी के पूजी जाती है।
राजपरिवार ने एक विशिष्ट समारोह का आयोजन किया
जैसलमेर रियासत की परंपरा के अनुसार चैत्र शुक्ला तृतीया को गणगौर की शाही सवारी निकाली जाती है. राजस्थान भर में चैत्र शुक्ला तृतीया को गणगौर की पूजा की जाती है। रविवार को सोनार दुर्ग के त्रिपोलिया कक्ष में पूर्व महारावल चेतन्यराज सिंह और राजपरिवार के लोगों ने गवर माता का पूजन विधि-विधान से किया। महाराज ने माता को आरती करने के बाद दुर्ग के चामुंडा माता मंदिर लाया। यहां हजारों शहरवासियों और सुहागिन महिलाओं ने माता को देखा और परिवार की खुशहाली और अपने ‘ईशर’ की सलामती की दुआ मांगी।
बिना पलक झपकाए इंतजार किया गया
जैसलमेर की इस गणगौर की प्रतिमा को आज भी ऐसे सजाया जाता है मानो वह उत्तर (बीकानेर) की ओर देखते हुए ईशर की वापसी की राह देख रही हो। यही कारण है कि जैसलमेर की गणगौर को ‘कुंवारी गणगौर’ या ‘अकेली गणगौर’ भी कहते हैं। यहां के लोगों के लिए यह परंपरा धार्मिक नहीं है; यह उनके ऐतिहासिक स्वाभिमान और अधूरी प्रेम कहानी का भी जीवंत प्रतीक है।
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