सरहुल पर्व: प्रकृति पर्व की पूरी कहानी, घड़े के पानी से बारिश का अनुमान लगाने की सदियों पुरानी परंपरा

Sarhul, प्राकृतिक उत्सवपूरे राज्य में सरहुल जनजातीय उत्सव है। सरहुल के मौके पर सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार, आदिवासी पुजारी पाहन की ओर से घड़ा में रखे पानी के स्तर को देखकर बारिश की बड़ी भविष्यवाणी करते हैं।

रांची: झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्र में सूर्य और पृथ्वी के मिलन का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा है। सरहुल प्रकृति पर्व पर साल (सखुआ) वृक्ष की पूजा की जाती है। आदिवासी समाज का मानना है कि सरना मां साल वृक्ष में रहती है, जो गांव को प्राकृतिक आपदाओं से बचाती है।

घड़े में पानी की मात्रा देखकर

सरहुल पर्व पर पाहन सरना स्थल में पूजा करता है। इस दौरान मिट्टी के घड़े में पानी डाला जाता है। दूसरे दिन घड़े में पानी की स्थिति को देखकर इस वर्ष पाहन से होने वाली बारिश का अनुमान लगाया जाता है।

पुरानी परंपरा के अनुसार, पाहन मिट्टी के बर्तनों को ले जाते हैं और फिर उनमें ताजा पानी भरते हैं। अगले दिन इन घड़ों को देखा जाता है। पानी की कमी को बारिश की कमी कहा जाता है। जब पानी घड़ों या मिट्टी के किसी अन्य बर्तन में पहले जितना ही रहता है, तो माना जाता है कि अच्छी बारिश होगी।

आदिवासी लोगों ने मछली और केकड़े को पृथ्वी का पूर्वज बताया

आदिवासी समाज में सरहुल पूजा के बाद ही लोग खेतों की जुताई, फसल बोने और वन उपज एकत्र करने लगते हैं। वहीं आदिवासी लोग मछली और केकड़े को पृथ्वी के पूर्वज मानते हैं एक पुरानी कहानी कहती है कि समुद्र की गहराई से मिट्टी निकालकर पृथ्वी को मछली और केकड़े नहीं बनाया गया था। इसलिए सरहुल के पहले दिन उन्हें पूजा जाती है। जनजातीय परंपरा में लोगों ने तालाब, पोखर या अन्य जलाशयों में मछली और केकड़ा पकड़ने की आदत डाली है। घर की रसोई में उसे लटका देते हैं। उन्हें पीसकर बाद में खेतों में डाला जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से फसल की पैदावार अच्छी होती है।

हातमा स्थान पर पूजा करने के बाद सिरमटोली तक विशाल शोभायात्रा

रांची में सरहुल पर्व की एक विशिष्ट परंपरा है। आदिवासी लोग रांची के हातमा स्थल में पूजा करके शक्ति स्थल सिरम टोली पहुंचते हैं। सरहुल पर्व के लिए कोई तय तिथि नहीं है। सरहुल का पर्व भी राज्य भर में अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है।

आदिवासी समाज त्योहार के दौरान सरना स्थल पर सखुआ और महुआ के फूलों से पूजा करता है। जनजातीय पुरुष, महिलाओं और बच्चे पारंपरिक कपड़े पहनकर पूजा करते हैं, जंगल, पहाड़ों और प्रकृति को पूजते हैं।

मुख्य आकर्षण महिलाओं, पुरुषों और बच्चों का सामूहिक नृत्य है

सप्ताह भर पहले से सरहुल पर्व की तैयारी शुरू हो जाती है। गांव के पाहन सरहुल से एक दिन पहले भोजन करते हैं। इस दौरान पुजारी सूर्योदय से पहले सरनास्थल पर दो नए घड़ों में पवित्र जल भरकर अर्पित करते हैं। बाद में सखुआ के वृक्ष की पूजा की जाती है और गांव की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। पूजा के दौरान मां सरना, सूर्य देवता, ग्राम देवता और पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। पूजा से पहले सरना स्थान अच्छी तरह से साफ किया जाता है। कुछ स्थानों पर मुर्गी या अन्य पशु पक्षियों को पूजा के दौरान बलि देने की पारंपरिक परंपरा भी है।

सरहुल उत्सव की तैयारी सप्ताह भर पहले से शुरू हो जाती है। गाँव में रहने वाले पाहन सरहुल से एक दिन पहले खाते हैं। सूर्योदय से पहले पुजारी सरनास्थल पर दो नए घड़ों में पवित्र जल भरकर अर्पित करते हैं। बाद में सखुआ के वृक्ष की पूजा की जाती है और गांव को सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। पूजा के दौरान मां सरना, सूर्य देवता, गांव देवता और पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। पूजा से पहले सरना स्थान को साफ करें। कुछ स्थानों पर पूजा के दौरान मुर्गी या अन्य पक्षियों को बलि देने की पारंपरिक परंपरा भी है।

1967 से रांची में चलने वाली बड़ी शोभायात्रा

पिछले कई दशकों से, सरहुल के अवसर पर रांची सहित राज्य के विभिन्न जिलों में उत्सव निकाला जाता है। 1967 में कार्तिक उरांव ने सरहुल के अवसर पर रांची में इस उत्सव की शुरुआत की। पहले आदिवासी जमीन की रक्षा करने के लिए उत्सव निकाला गया। इस उत्सवयात्रा के जरिए आदिवासी लोग अपनी संस्कृति, परंपरा और जीवन शैली को प्रदर्शित करते हैं। शोभा यात्रा के माध्यम से आदिवासी लोग विश्व को बताना चाहते हैं कि प्रकृति ही उत्साह और उत्साह का रहस्य है।

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