तीन राज्यों, गुजरात भी शामिल हैं, ईरान का काला बादल सभी को खतरा है

अब दुनिया के अधिकांश देशों पर ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच चल रहे युद्ध का असर होने वाला है। यह स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाल सकता है, खासकर आर्थिक रूप से। गुजरात सहित भारत के तीन राज्यों पर इसका बुरा प्रभाव हो सकता है। प्रफेसर अंजल प्रकाश, पर्यावरण नीति और जलवायु वैज्ञानिक, ने इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है।

नई दिल्ली: अमेरिका-इजराइल ने ईरान के तेल उत्पादन स्थानों पर हवाई हमले की वजह से राजधानी तेहरान और आसपास के क्षेत्रों में बादल छा गए। लोगों को सांस लेना मुश्किल हुआ क्योंकि धुएं थीं। ईरान की Red Cross Society ने लोगों को एसिड रेन से बचने की चेतावनी दी है। गुजरात, राजस्थान और पंजाब को चुनौती मिल सकती है।

पूनम गौड़ ने प्रमुख जलवायु वैज्ञानिक और पर्यावरण नीति विशेषज्ञ प्रोफेसर अंजल प्रकाश से बात की कि इन एसिड रेन और जहरीले बादलों का ईरान सहित पूरी दुनिया पर क्या प्रभाव होगा।

डॉ. अंजल, भारती इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी के रिसर्च डायरेक्टर और भारतीय स्कूल ऑफ बिजनेस में क्लिनिकल असोसिएट प्रफेसर (रिसर्च) हैं, जो IPCC की कई रिपोर्टों में प्रमुख लेखक रहे हैं।

भारत को भी तेल के इन काले बादलों से क्या खतरा है?

वर्तमान में ईरान से बलूचिस्तान (पाकिस्तान के पश्चिमी भाग) तक हवाएं उत्तर-पश्चिमी दिशा में चल रही हैं। इन बादलों और जहरीले धुएं को लेकर पाकिस्तान का मौसम विभाग पहले से ही चेतावनी जारी कर चुका है। भारत में फिलहाल सीधा खतरा कम है। इसकी मुख्य वजह हिमालय और ईरान से दूरी है।

फिर भी, मजबूत जेट स्ट्रीम (ऊपरी सतह पर चलने वाली तेज हवाएं) इस काले गुबार के छोटे कणों को गुजरात, राजस्थान या पंजाब तक ले जा सकती है। पड़ोसी देशों, जैसे अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान, पहले प्रभावित होंगे। HYSPLIT जैसे विश्वव्यापी मॉडलों ने दिखाया कि तेल जलने से निकलने वाले कण पांच से दस दिनों में 2000 से 3000 किमी तक फैल सकते हैं।

कितने समय तक इन जहरीले बादलों से होने वाली एसिड रेन का प्रभाव रह सकता है? इसका प्रभाव जमीन और जनसंख्या पर कैसा होगा?

इस एसिड रेन का तत्काल असर एक से दो हफ्ते तक रह सकता है, लेकिन इसका दीर्घकालीन प्रभाव कई बरसों तक रहता है। 10 से 20 वर्ष तक मिट्टी में एसिडिटी बनी रह सकती है। मिट्टी की बफर क्षमता इससे कम हो जाएगी। इसकी वजह से 20 से 30 प्रतिशत तक लोगों में श्वास संबंधित रोग हो सकते हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर ज्यादा खतरा है। खेतों में 10 से 15 प्रतिशत की उपज कम हो सकती है। इससे आने वाले समय में खाद्य संकट भी होगा।

एसिड रेन, खासतौर पर तेहरान के लिए, पर्यावरण के लिए कितनी खतरनाक है

एसिड रेन से वनों की जैव विविधता नष्ट हो जाती है, जड़ें कमजोर हो जाती हैं और पत्तियां झुलस जाती हैं। मानवों में न्यूरोलॉजिकल विकार हो सकता है। तेहरान जैसे घनी आबादी वाले शहर में महामारी की तरह हालात हो सकते हैं क्योंकि वहाँ पहले से ही वायु प्रदूषण अधिक है। हाल ही में वियतनाम का एजेंट ऑरेंज ने यूक्रेन युद्ध के प्रदूषण की आशंका व्यक्त की है।

भारी धातुओं, जैसे लेड और मरकरी, को मिट्टी और पानी में इन केमिकल बादलों ने जमा कर दिया जाएगा। ये खाने के माध्यम से शरीर में प्रवेश करेंगे और फिर DNA को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कैंसर जैसे घातक रोग का भी खतरा है।

रूस-यूक्रेन के बाद अब अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष को आप कैसे देखते हैं? क्या युद्ध प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के खिलाफ लड़ाई कमजोर हो रही है?

देशों की इच्छाशक्ति ने पर्यावरण संरक्षण में अच्छे परिणाम दिखाए हैं। पेरिस समझौते से उत्सर्जन में कमी आई है, लेकिन युद्धों ने पर्यावरण पर बुरा प्रभाव डाला है। यूक्रेन में बमबारी ने 35 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO) का नुकसान किया। अब ईरान में तेल जलने से हर दिन लाखों टन ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में प्रवेश करती है। यह निश्चित रूप से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रहा है।

गुजरात सहित तीन राज्य प्रभावित होंगे

ईरान के तेल ठिकानों से उठते काले गुबार के छोटे-छोटे कण गुजरात, राजस्थान या पंजाब तक पहुंच सकते हैं अगर ऊपरी सतह पर मजबूत तेज हवाएं चलती हैं। पड़ोसी देशों जैसे अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान पहले प्रभावित होंगे।

दुनिया ने पिछले एक साल में 1.5 डिग्री की सीमा पार कर ली है। इन युद्धों के कारण कितनी गर्मी बढ़ सकती है?

यह युद्ध उत्सर्जन को 2.3 से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा सकता है। ईरान जैसे तेल उत्पादक देश में युद्ध से कोयले पर निर्भरता बढ़ेगी और वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा होगा। इसकी वजह से गर्मी भी बढ़ सकती है। राहत और बचाव के उपाय क्या हो सकते हैं?

ईरान को ऐसा करना होगा

ईरान को तुरंत वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाले स्टेशन बनाने, चूने से प्रभावित मिट्टी को न्यूट्रलाइज करने और स्वास्थ्य शिविर बनाने चाहिए। UNEP-WHO की संयुक्त सहायता टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भेजी जानी चाहिए। वैश्विक संधियों में युद्धकालीन पर्यावरण संरक्षण खंडों को शामिल करना आवश्यक है।

भारत को मॉनसून पूर्व चेतावनी देने और पाकिस्तान की सीमा पर निगरानी बढ़ानी चाहिए। विकासशील देशों के लिए जलवायु शांति कोष बनाया जाए, जो युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में हरित पुनर्वास के लिए धन देगा। पर्यावरण अपराधों का मुकदमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों में चलाया जाएगा।

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